मद्धम स्लेटी,
कितने सारे बादल
छाये हैं।
अद्भुत
मेरे सतरंगी सपने
सब एक रंग में
ही आए हैं!
मद्धम स्लेटी से
उन बादलों में,
खोजता हूँ
तुम्हारा चेहरा।
वो शायद नाक है वहाँ
और वो शायद आँखें
जहाँ रंग है गहरा।।
तस्वीर तुम्हारी ये हर पल
बनती है, बिगड़ती है
सुधरती है,
संवरती है।
शायद वैसे ही जैसे,
मेरे मन में
हर पल एक नयी
छवि तुम्हारी
घर करती है।।
आँखें बंद करुँ
सोचूँ तुम्हें,
पर हंस देती हो तुम
जैसे ही पास आती हो।
क्यूँ तंग करती हो,
हर बार
सब रंग
बिखेर जाती हो!
वहाँ नभ में भी
यही चला करता है
तंग करना
हँसना, खेलना।
मत सताओ,
शायद यही कहते
होंगे हवा से
ये मेघ ना!
सौ साल का सिनेमाः जीजा वही जो सिनेमा दिखाए
2 दिन पहले




9 comments:
is it for some Meghna ??? ... if it is then its amazing .. truly creative
Dil ko chhu gayee rachnaa.
{ Treasurer-S, T }
इस प्रतिपल व्याकुल-चंचल मन को,
क्या जानू मै |
दूर हो मुझसे, पास मेरे तुम,
क्या मानू मै |
घिरा हुआ हूँ अंतरमन के इन् द्वंदों में,
ये तुम हो, या कोई और कल्पना इन छंदों में |
~ अनुपम निमितमात्र
are aapne pyar ko itana jiwant kar diya hai ki padhate wakta .......pyar ki khushaboo aaspas bikhar padhi .....bahut hi sundar rachana .......shat shat badhaaee
अभिषेक जी,
आपकी कविता " बदली " पढी.बहुत ही प्यारी सी मासूम अभिव्यक्ति है. ईश्वर करे जिसकी छवि आप बादलों में ढूँढ रहे हैं,वो आपके पास हो! सुन्दर रचना के लिए बधाई !
किरण सिन्धु
@Ankur
काश मेघना होती मेरी ज़िन्दगी में !!!
@ अर्शिया
बहुत बहुत धन्यवाद!
@ ओम जी
ये मेरे लिखने का असर नहीं, ये तो प्यार का असर है. खुशबू खुद बखुद बिखर जाती है!
आपको कविता पसंद आई, बहुत धन्यवाद.
@अनुपम
बहुत खूब!
@किरन सिन्धु
आंटी, प्लीज़ मुझे अभिषेक जी मत कहिये, मैं तो आपके बेटे जैसा हूँ!
और दूसरी बात, भगवान् मेरी नहीं सुनते. प्लीज़ आप ही उनसे कह दीजिये. शायद आपकी मान लेंगे!
your best till now. Really great
अभिषेक, कमाल का लिखा है |
दिल खुश हो गया पढ़ के | इतनी छोटी छोटी पंक्तियों से इतना गहरा असर !
सुबह सुबह ये पढ़ लिया, अब काम करने का भी दिल नहीं कर रहा ... एक बार फिर से पढता हूँ :)
हर जीव-निर्जीव में व्यक्तित्व और आत्मा होती है। यह पोस्ट अहसास करा गई!
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