गुरुवार, 9 अगस्त 2007

शाम-ए-अवध

कभी सुना था कि लोग कहते थे मुस्कुराइये कि आप लखनऊ में हैं! अब तो टेंपो के धुंए और सत्ताधारी दलों के नेताओं और उनके गुर्गों के कारनामों ने शर्म से अगर मुँह काला ना किया हो तो ज़रूर मुस्कुराइये!

लेकिन कोई कुछ भी कहे इस शहर की चंद पुरानी इमारतें अभी तक अपने आप को 'जेनरेशन गैप' या किसी ठेकेदार के लालच की बलि चढ़ने से तो बचाएँ हैं ही, शहर को भी सांस्कृतिक विरासत के नाम पर एक सम्मानजनक पायदान पर ला खड़ा करती हैं!

5 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

वाह भई, एक अर्सा बीता था लखनऊ की सैर किये. सब फिर जिंदा हो गया भले ही तस्वीरों से.

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

नवाब वाजिद अली शाह, लखनऊ (अवध) के आखिरी बादशाह ही नहीं, शायद लखनऊ के आखिरी सच्चे आशिक भी थे. नवाबों ने लखनऊ को अपनी मेहबूबा की तरह सजाया, संवारा, निखारा, जिसके आंचल में एक तहज़ीब पनपी.
1856 के बाद, ना नवाब रहे और ना रहे लखनऊ के आशिक और रखवाले, फिर तो लखनऊ सिर्फ़ लुटा. उसकी तहज़ीब लुटी, तमीज़ लुटी, इमारतें लुटीं और लुटी शाम-ए-अवध !
बस अब तो महज़ साँस ले रहा है, अपने अतीत की फटी चिथड़ी चादर से अपनी आबरू ठकने की कोशिश कर रहा है. इस इंतज़ार में कि कभी तो वो सुबह आयेगी जिसकी ढलती साँझ को फिर से सजेगी - शाम-ए-अवध.
फोटुएँ बहुत सुंदर लगाई हैं, क्या इनको कहीं से डाउनलोड कर सकता हूँ?

Vaibhav ने कहा…

Nice photos .. still there is a lot to see.

Abhishek ने कहा…

अनुराग मेरे बडे भाई का भी नाम है तो अनुराग जी अगर आपको 'बडे भैया' कहूं तो चलेगा ना?
फोटो की तारीफ के लिए शुक्रिया! डाउन लोड कर सकते हैं यहाँ से: http://www.flickr.com/photos/asty/tags/lucknow/

Neha ने कहा…

nice photos.....i have never been to lucknow...think i should go now :)