मंगलवार, 30 जून 2015

कुछ भूले कुछ याद रहा

अरसा हो गया कुछ लिखे. हिंदी में तो और भी ज़्यादा.

कभी कभी अपने ही पुराने ब्लॉग पढता हूँ, अच्छे भी लगते हैं. सोचता हूँ फिर से कुछ लिखूं पर लिखा नहीं जाता. पता नहीं क्यूं.

खुद को धोखा भी देना मुश्किल नहीं होता.

"समय नहीं मिलता"
"ऑफिस में बहुत काम है"
"बेटी छोटी है, बैठने ही नहीं देती"

और भी तमाम ऐसे बहाने. सारी ज़िन्दगी ही बहानों से भर गयी है. हर हार के लिए, एक बहाना तैयार मिलेगा. अक्सर सोचता हूँ, कि वो सब जो खो दिया है, वापस लाऊंगा पर क्या और कैसे, इन सवालों के जवाब ही नहीं होते.

और वास्तव में विकर्षणों की कमी नहीं है पर विकर्षित होना तो अपनी कमज़ोरी है.

कुछ तो करना पड़ेगा। बचपन में अपनी लिखी कविताओं की एक डायरी जला दी थी, पता नहीं किस धुन में आ कर. इस ब्लॉग को तो जला नहीं सकता, लेकिन इसको भूल जाना वैसा ही कुछ हो जाएगा!

अपने आप से ये वादा करता हूँ. फिर से लिखूंगा. कई बार ऐसा होगा जब शब्द दिमाग से उँगलियों तक आने से मना कर देंगे पर फिर भी कुछ न कुछ तो लिखूंगा ही. 

सोमवार, 28 जुलाई 2014

कम्यूनल

कल तक सबकी थी,
आज ईद उनकी,
दीवाली हमारी हो गयी. 
एक दूसरे को शक़ की नज़र से 
देखने की बीमारी हो गयी। 

कल तक एक धड़कन थी 
एक जान थी, 
एक दिल था, 
आज बस भीड़ के दो दल हो गए. 
कोई माने या ना माने 
सच तो यही है कि 
हम सब कम्यूनल हो गए!

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

इंतज़ार

अभी तुम्हारी छोटी छोटी आँखें
मुझे नहीं पहचानेंगी

अभी तुम्हारे छोटे छोटे होंठ
मुझे नहीं पुकारेंगे

अभी तुम्हारे छोटे छोटे कान
मेरी आवाज़ को अनसुना कर देंगे

अभी तुम्हारी छोटी छोटी उंगलियाँ
मेरी शर्ट को नहीं खींचेंगी

अभी तुम्हारे छोटे छोटे पैर
मेरे साथ नहीं चलेंगे

पर मुझे पता है
एक दिन आएगा, जब ये सब होगा
और तब तक
मेरी छोटी दोस्त
मैं इंतज़ार करूंगा!

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

हंसिया चाँद

(पूनम का चाँद तो सब को लुभाता है, लेकिन चाँद हर दिन तो एक जैसा नहीं रहता. ये कविता उस चाँद के नाम जो अमावस के बाद निकलता है, और उतना खूबसूरत हो न हो, होता तो हमारा इकलौता चाँद ही है ना!)

आज रात है
हंसिया चाँद,
इतराता शर्माता
रंग-रसिया चाँद.

बिछी बिसात पे
प्यादे जैसा चाँद,
एक कमज़ोर
इरादे जैसा चाँद.

मुरझाई छुई-मुई
की डाली चाँद,
गुनगुनी चाय की
प्याली चाँद.
  
सच कहो तो ये है
बस नाम का चाँद,
पर जो भी है,
यही है हर रहीम और
हर राम का चाँद।।

(हंसिया = sickle)

  

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

दोस्त

 
कुछ भूल गए,
कुछ याद रहे.
कुछ बिछड़ गए,
कुछ साथ रहे.

कुछ सुने हुए से 
किस्सों से,
कुछ बुने हुए से
हिस्सों से.

कुछ गैरों के,
कुछ अपनों के.
कुछ सच्चे और
कुछ सपनों से.

कुछ फिर मिलने
के वादे थे
'टच' में रहने के 
इरादे थे.

फोन में नंबर
अभी भी हैं,
बर्थडे रिमाइंडर
अभी भी हैं.

पर एक अनदेखा
सा दुश्मन है
शायद वो मेरा
अंतर्मन है.

बढ़ता हूँ,
रुक जाता हूँ.
सच कहूं तो,
अहम् के आगे
झुक जाता हूँ.

शायद इसीलिए..
कुछ भूल गए,
कुछ याद रहे.
कुछ बिछड़ गए,
कुछ साथ रहे.  

बुधवार, 21 सितंबर 2011

अथ श्री NEW महा भारत कथा

'माधव', 'केशव', 'वासुदेव' वगैरह के बाद जब अर्जुन ने 'यादव कुल गौरव' कह कर संबोधित किया तो कृष्ण झल्ला गए. "यार ये बाकी सब ठीक है पर 'यादव कुल गौरव' सुन के ऐसा लगता है जैसे यू.पी. का कोई समाजवादी  सभासद अखिलेश यादव को मस्का लगा रहा है."

अर्जुन का लटका मुंह और भी लटक गया. वैसे भी जबसे तीरंदाजी असोसिएशन का चुनाव हारे थे, अर्जुन को कोई पूछने वाला भी नहीं था. कृष्ण ने पहले भी समझाया था कि खेल असोसिएशन में तो किसी नेता की सिफारिश से भी काम नहीं चलने वाला, क्योंकि खुद सारे नेता इन खेल संस्थाओं के मुखिया हैं.

वैसे कृष्ण पर भी काफी प्रेशर था. मथुरा में जन्माष्टमी के लाइव कवरेज के लिए कई देशी विदेशी चैनल लाइन में थे लेकिन मुख्या प्रबंधक महोदय के भाई के साले के चचेरे भाई के चैनल को ही टेलीकास्ट राइट्स मिलेंगे ऐसी बात मीडिया में लीक हो गयी थी. अब अगर ये राइट्स पिछले बार से भी कम दामों पर गए तो वैष्णो देवी और तिरुपति बालाजी तो देवताओं के अनुअल गेट-टुगेदर में कृष्ण की इज्ज़त का चीरहरण कर देंगे!

ये लोग यही सब माथा पच्ची कर रहे थे कि भीम भी आ गए. चुनाव का सीज़न नहीं था सो उनके अखाड़े के पहलवानों की कोई डिमांड नहीं थी पर खिलाने पिलाने का खर्च तो था ही. कृष्ण ने उनको अर्जुन के दुःख के बारे में बताया तो भीम उल्टा अर्जुन पर ही बरस पड़े "अरे कृष्ण, मैंने भी तो इसको समझाया था. कुश्ती महासंघ और वेट लिफ्टिंग फेडरेशन के चुनावों में मेरे साथ क्या हुआ था, ये देख कर भी इसको अकल नहीं आयी तो कोई क्या करे. अरे ये सब छोड़ो मेरी सुनो. ये आजकल सारी दुनिया को जो अन्ना हजारे का गांधीगिरी का रोग लगा है ना, हम जैसों के पेट पे तो लात पड़ गयी. ना कोई लोन रिकवरी के लिए पहलवान ले रहा है ना घर खाली कराने के लिए. ये मुश्टंडे तो मेरे गले पड़ गए हैं."

तभी 'दुर्योधन भैया अमर रहें' और 'दुर्योधन तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं' के नारे लगाती ६-८ जीप और २०-२५ मोटर साइकिलों का एक काफिला धूल उड़ाता हुआ निकल गया. अर्जुन बोले 'साला काहे का संघर्ष. दलबदलू की औलाद. पहले मुलायम के आगे पीछे घूमता था, अब मायावती के पीछे.' भीम ने कहा, "यार समझ नहीं आया मायावती ने इसको ले कैसे लिया". कृष्ण बोले "अरे सीधा फंडा है भाई. इसके और इसके भाइयों के परिवार के इतने वोट हैं, इसकी सीट तो पक्की है ही."

इतना कहते हुए वो उठ खड़े हुए और बोले 'अच्छा मैं ज़रा निकलता हूँ. इंडिया टीवी में उनकी वो एलियन और गाय वाली स्टोरी थी ना, उस न्यूज़ पर पैनल डिस्कशन में जाना है." और उन्होंने अपनी स्प्लेंडर स्टार्ट की और निकल गए. 

अर्जुन और भीम दुर्योधन के काफिले की उड़ती हुई धूल देखते रह गए. 


शुक्रवार, 24 जून 2011

मेरी शादी का पहला साल!

हमें एक हुए ,
एक साल हो गया।
अरे पता ही नहीं चला,
ये तो कमाल हो गया।

अभी कल ही तो
मैं पहली बार तुमसे मिलने आया था,
तुम कुछ शरमाई हुई सी थी और
शायद मैं भी कुछ घबराया था.

कल ही तो हमने अपने घर के लिए
कितने सारे सपने सजाये थे।
और जब बारिश का पानी खिड़की से अन्दर आ गया
तब भीगे हुए गद्दे उठाये थे!

कल ही तो हमारे
रूठने मनाने की शुरुआत हुई थी।
और जब मैंने डांटा तो तुम्हारे
आंसुओं की बरसात हुई थी!

कल ही तो हम
तेज़ बारिश में भीगते हुए घर आये थे,
धूप नहीं निकली थी अगले हफ्ते
और कमरे में पंखे के नीचे कपड़े सुखाये थे।

कल ही तो हमने
अपने सपनों को कुछ नाम दिए थे,
कल ही तो हमने एक-दूसरे को
अपने सुबह और शाम दिए थे।

कल ही तो ज़िन्दगी ने
कंधे पर हौले से छू के मुझसे कहा
तुम अकेले थे ना
इसलिए एक साथी दे दिया।

कल ही कल में वो
सारे पल ना जाने कैसे बीते।
अब सोचता हूँ तो याद आते हैं वो सारे पल,
मुस्कुराते, गुनगुनाते, हँसते और जीते!

अभी तो एक लम्बा सफ़र है,
पर ख़ुशी तो होती है ना जब अच्छी शुरुआत हो।
आगे बहुत मुश्किलें आएंगी ज़रूर,
पर चिंता नहीं मुझे जब तुम साथ हो।