हमें एक हुए ,
एक साल हो गया।
अरे पता ही नहीं चला,
ये तो कमाल हो गया।
अभी कल ही तो
मैं पहली बार तुमसे मिलने आया था,
तुम कुछ शरमाई हुई सी थी और
शायद मैं भी कुछ घबराया था.
कल ही तो हमने अपने घर के लिए
कितने सारे सपने सजाये थे।
और जब बारिश का पानी खिड़की से अन्दर आ गया
तब भीगे हुए गद्दे उठाये थे!
कल ही तो हमारे
रूठने मनाने की शुरुआत हुई थी।
और जब मैंने डांटा तो तुम्हारे
आंसुओं की बरसात हुई थी!
कल ही तो हम
तेज़ बारिश में भीगते हुए घर आये थे,
धूप नहीं निकली थी अगले हफ्ते
और कमरे में पंखे के नीचे कपड़े सुखाये थे।
कल ही तो हमने
अपने सपनों को कुछ नाम दिए थे,
कल ही तो हमने एक-दूसरे को
अपने सुबह और शाम दिए थे।
कल ही तो ज़िन्दगी ने
कंधे पर हौले से छू के मुझसे कहा
तुम अकेले थे ना
इसलिए एक साथी दे दिया।
कल ही कल में वो
सारे पल ना जाने कैसे बीते।
अब सोचता हूँ तो याद आते हैं वो सारे पल,
मुस्कुराते, गुनगुनाते, हँसते और जीते!
अभी तो एक लम्बा सफ़र है,
पर ख़ुशी तो होती है ना जब अच्छी शुरुआत हो।
आगे बहुत मुश्किलें आएंगी ज़रूर,
पर चिंता नहीं मुझे जब तुम साथ हो।
शुक्रवार, 24 जून 2011
शनिवार, 9 अप्रैल 2011
पर भ्रष्ट है कौन?
सबसे पहले तो किसन बापट बाबूराव हजारे यानि अन्ना हजारे को कोटिशः धन्यवाद। वैसे सच तो ये है कि अन्ना को जितने भी धन्यवाद दिए जाएं वो कम हैं क्यूंकि ७२ साल के इस बूढ़े आदमी ने हमारे समाज को और हम सब को एक गहरी नींद से जगा दिया और लोगों को मजबूर कर दिया कि वो अपने एसी ऑफिस से निकल कर सड़क पर आएं, 'हम कर ही क्या सकते हैं' की हताशा को छोड़ें और सरकारों को बताएं कि चुनाव के ५ साल के बीच में भी जनता जाग सकती है।
लेकिन मैं एक बात समझना चाहता हूँ। भ्रष्टाचार है क्या? क्यूंकि इसके बारे में जितना पढ़ा, सुना, देखा है उससे तो यही लगता है कि भ्रष्टाचार का मतलब सरकारी दफ्तरों और कर्मचारियों में रिश्वतखोरी की आदत है या फिर मंत्रियों और उद्योगपतियों की मिलीभगत। भ्रष्टाचार की बात आती है तो फिर समाज और 'मिडिल क्लास' यानि मध्यम वर्ग को कैसे भूल सकते हैं।
मैं ये समझना चाहता हूँ कि समाज कौन है? या फिर अगर हम मध्यम वर्ग पर ध्यान केन्द्रित करें तो मध्यम वर्ग किन लोगों से बनता है? स्कूल के अध्यापक, डॉक्टर, वकील, सॉफ्टवेयर कर्मी, सरकारी बाबू, छोटे और मध्यम व्यापारी और ऐसे ही तमाम लोग। क्या अध्यापक कक्षा में पढ़ाने के बजाये ट्यूशन नहीं करते? क्या सॉफ्टवेयर कर्मी झूठे मेडिकल बिल नहीं बनवाते? क्या व्यापारी धांधली नहीं करते? डॉक्टर और वकील अनोखे तरीकों से अपने ग्राहकों से ज्यादा पैसे नहीं ऐंठते? कहने का तात्पर्य ये है कि समाज जिन लोगों से बनता है उन सभी लोगों के भ्रष्टाचार की वजह से समाज त्रस्त है, वजह कहीं बाहर नहीं है अन्दर ही है।
ये भी सच है कि राजनीतिज्ञों को क्लीन चिट नहीं दी जा सकती और जब तक ऊंचे पदों पर बैठे नेता और उनके करीबी भ्रष्ट अफसरों पर लगाम नहीं लगती तब तक ये उम्मीद रखना बेकार है कि छोटे कर्मचारी अपना काम ईमानदारी से करेंगे, या कहें, कर सकेंगे! लेकिन क्या ये एक जायज़ बात है कि क्यूंकि सरकार भ्रष्ट है इसलिए हम भी अपने स्तर का भ्रष्टाचार करेंगे? मुझे नहीं लगता।
हमारी आदत है हर चीज़ के लिए दूसरों पर उँगली उठाने की। भ्रष्टाचार ख़त्म करना है तो सरकार करे, न्यायपालिका करे, मीडिया करे, अन्ना हजारे करें। हम क्या करें? हमारी ज़िम्मेदारी क्या सिर्फ 'अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं' बोल कर ख़त्म हो जाती है? ध्यान रखिये कि जनता को वही नेता मिलता है जिसके वो लायक होती है। हमारे नेता, हमारे अफसर, हमारे बाबू कहीं पाकिस्तान से आयात (इम्पोर्ट) नहीं होते, वो हमारे बीच में से आते हैं। हमारे भाई, बहन, पड़ोसी, परिचित होते हैं। भ्रष्टाचार ख़त्म करना है तो हमें सुधरना पड़ेगा। अन्यथा ना तो जन लोकपाल बिल कोई जादू की छड़ी है और ना अन्ना कोई जादूगर, जो बस पलक झपकते ही भ्रष्टाचार ख़त्म कर देंगे!
मैं ये समझना चाहता हूँ कि समाज कौन है? या फिर अगर हम मध्यम वर्ग पर ध्यान केन्द्रित करें तो मध्यम वर्ग किन लोगों से बनता है? स्कूल के अध्यापक, डॉक्टर, वकील, सॉफ्टवेयर कर्मी, सरकारी बाबू, छोटे और मध्यम व्यापारी और ऐसे ही तमाम लोग। क्या अध्यापक कक्षा में पढ़ाने के बजाये ट्यूशन नहीं करते? क्या सॉफ्टवेयर कर्मी झूठे मेडिकल बिल नहीं बनवाते? क्या व्यापारी धांधली नहीं करते? डॉक्टर और वकील अनोखे तरीकों से अपने ग्राहकों से ज्यादा पैसे नहीं ऐंठते? कहने का तात्पर्य ये है कि समाज जिन लोगों से बनता है उन सभी लोगों के भ्रष्टाचार की वजह से समाज त्रस्त है, वजह कहीं बाहर नहीं है अन्दर ही है।
ये भी सच है कि राजनीतिज्ञों को क्लीन चिट नहीं दी जा सकती और जब तक ऊंचे पदों पर बैठे नेता और उनके करीबी भ्रष्ट अफसरों पर लगाम नहीं लगती तब तक ये उम्मीद रखना बेकार है कि छोटे कर्मचारी अपना काम ईमानदारी से करेंगे, या कहें, कर सकेंगे! लेकिन क्या ये एक जायज़ बात है कि क्यूंकि सरकार भ्रष्ट है इसलिए हम भी अपने स्तर का भ्रष्टाचार करेंगे? मुझे नहीं लगता।
हमारी आदत है हर चीज़ के लिए दूसरों पर उँगली उठाने की। भ्रष्टाचार ख़त्म करना है तो सरकार करे, न्यायपालिका करे, मीडिया करे, अन्ना हजारे करें। हम क्या करें? हमारी ज़िम्मेदारी क्या सिर्फ 'अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं' बोल कर ख़त्म हो जाती है? ध्यान रखिये कि जनता को वही नेता मिलता है जिसके वो लायक होती है। हमारे नेता, हमारे अफसर, हमारे बाबू कहीं पाकिस्तान से आयात (इम्पोर्ट) नहीं होते, वो हमारे बीच में से आते हैं। हमारे भाई, बहन, पड़ोसी, परिचित होते हैं। भ्रष्टाचार ख़त्म करना है तो हमें सुधरना पड़ेगा। अन्यथा ना तो जन लोकपाल बिल कोई जादू की छड़ी है और ना अन्ना कोई जादूगर, जो बस पलक झपकते ही भ्रष्टाचार ख़त्म कर देंगे!
शनिवार, 1 जनवरी 2011
नवल वर्ष
सूर्य नव,
प्रकाश नव,
आकाश नव,
अवकाश नव।
वर्ष नव,
हर्ष नव,
विश्व का प्रदर्श नव,
अब समय है
हो आदर्श नव
प्रकाश नव,
आकाश नव,
अवकाश नव।
वर्ष नव,
हर्ष नव,
विश्व का प्रदर्श नव,
अब समय है
हो आदर्श नव
बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
तुम
आज मैं
मैं नहीं,
तुम भी
तुम ना रहो।
सब कुछ
चाहता हूँ सुनना
कुछ भी ना कहो।
पास बैठो,
सपनों की कहानियां
सुनाऊँ मैं
तुम भी अपनी यादों की।
कोई और बात ना हो,
बस बातें करें
बातों की।
साँसों में बसा लूं
तुम्हारे साथ
बिताया हर पल।
हर पल
एक ज़िन्दगी सा लगेगा
ज़िन्दगी जब
ख़त्म होगी कल।
आज पास रहो
साथ रहो,
आखें करें बातें
हम तो बस सुनें.
बैठें
गुपचुप, खामोश,
और सपने बुनें।
मैं नहीं,
तुम भी
तुम ना रहो।
सब कुछ
चाहता हूँ सुनना
कुछ भी ना कहो।
पास बैठो,
सपनों की कहानियां
सुनाऊँ मैं
तुम भी अपनी यादों की।
कोई और बात ना हो,
बस बातें करें
बातों की।
साँसों में बसा लूं
तुम्हारे साथ
बिताया हर पल।
हर पल
एक ज़िन्दगी सा लगेगा
ज़िन्दगी जब
ख़त्म होगी कल।
आज पास रहो
साथ रहो,
आखें करें बातें
हम तो बस सुनें.
बैठें
गुपचुप, खामोश,
और सपने बुनें।
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
गणेश विसर्जन : फ़ोटो कथा
सोमवार, 2 अगस्त 2010
हम करें नेकी, वो डालें दरिया में!
स्टार प्लस पर पिछले दिनों एक नया म्यूजिकल रिअलिटी शो शुरू हुआ जिसमें भारत और पाकिस्तान के बच्चे भाग ले रहे हैं। 'छोटे उस्ताद' नाम का ये शो पहले भी आता था, लेकिन तब इसमें सिर्फ भारतीय बच्चे ही होते थे। इस बार इस कार्यक्रम के जज पाकिस्तानी गायक राहत फ़तेह अली खान और भारतीय गायक सोनू निगम हैं।
पिछले ही हफ्ते एक और खबर सुर्ख़ियों में थी: वाशिंगटन के एक संस्थान द्वारा कराये गए एक सर्वे में मालूम पड़ा कि ५३ % पाकिस्तानियों के लिए अल कायदा और तालिबान से बड़ा खतरा भारत है. वो तब है जब पाकिस्तान में आये दिन बम विस्फोट में नागरिक मारे जा रहे हैं.
आधे से ज्यादा पाकिस्तानियों के लिए भारत ज्यादा बड़ा खतरा है? नहीं नहीं, कहीं तो कुछ गलती हो गयी हो गयी होगी शोधकर्ताओं से. आखिर हम 'छोटे उस्ताद' जैसे कार्यक्रमों के ज़रिये पाकिस्तानियों के साथ बेहतर रिश्ते बना रहे हैं. उनके गायक और अभिनेता हमारी फिल्मों में काम करते हैं, हमारी फिल्में और संगीत उनके यहाँ बहुत लोकप्रिय हैं... वगैरह वगैरह.
हम कब तक अपने आप को इन सब दलीलों से बेवकूफ बनाते रहेंगे. हमेशा से हम कहते आये कि दीवारें तो सरकारों की बनायी हुई हैं, दोनों देशों के लोग तो आपस में प्रेम और भाईचारे से रहना चाहते हैं। हर साल वाघा सीमा पर मोमबत्ती जला जला के दोस्ती के गीत गाये गए, उनके कलाकारों और खिलाड़ियों को हमेशा इतना प्यार और सम्मान दिया गया , उनके देश के बच्चों के मुफ्त इलाज किये गए।
इतने साल तक दोस्ती के पुल बनाते रहने का ये फल मिला है?
अब हमको ये सवाल पूछना चाहिए कि कब तक हम दोस्ती का हाथ बढाते रहेंगे और कब तक उम्मीद करते रहेंगे कि उधर से जो हाथ बढ़ेगा उसमें पिस्तौल नहीं होगी? पहल करने की भी एक सीमा होती है, पहल का जब जवाब ना आये तो अकल आ जानी चाहिए. अगर हमारी भलमनसाहत का पाकिस्तानी यह जवाब देंगे तो कब तक हम उनसे बेहतर रिश्तों की उम्मीद करते रहेंगे?
पिछले ही हफ्ते एक और खबर सुर्ख़ियों में थी: वाशिंगटन के एक संस्थान द्वारा कराये गए एक सर्वे में मालूम पड़ा कि ५३ % पाकिस्तानियों के लिए अल कायदा और तालिबान से बड़ा खतरा भारत है. वो तब है जब पाकिस्तान में आये दिन बम विस्फोट में नागरिक मारे जा रहे हैं.
आधे से ज्यादा पाकिस्तानियों के लिए भारत ज्यादा बड़ा खतरा है? नहीं नहीं, कहीं तो कुछ गलती हो गयी हो गयी होगी शोधकर्ताओं से. आखिर हम 'छोटे उस्ताद' जैसे कार्यक्रमों के ज़रिये पाकिस्तानियों के साथ बेहतर रिश्ते बना रहे हैं. उनके गायक और अभिनेता हमारी फिल्मों में काम करते हैं, हमारी फिल्में और संगीत उनके यहाँ बहुत लोकप्रिय हैं... वगैरह वगैरह.
हम कब तक अपने आप को इन सब दलीलों से बेवकूफ बनाते रहेंगे. हमेशा से हम कहते आये कि दीवारें तो सरकारों की बनायी हुई हैं, दोनों देशों के लोग तो आपस में प्रेम और भाईचारे से रहना चाहते हैं। हर साल वाघा सीमा पर मोमबत्ती जला जला के दोस्ती के गीत गाये गए, उनके कलाकारों और खिलाड़ियों को हमेशा इतना प्यार और सम्मान दिया गया , उनके देश के बच्चों के मुफ्त इलाज किये गए।
इतने साल तक दोस्ती के पुल बनाते रहने का ये फल मिला है?
अब हमको ये सवाल पूछना चाहिए कि कब तक हम दोस्ती का हाथ बढाते रहेंगे और कब तक उम्मीद करते रहेंगे कि उधर से जो हाथ बढ़ेगा उसमें पिस्तौल नहीं होगी? पहल करने की भी एक सीमा होती है, पहल का जब जवाब ना आये तो अकल आ जानी चाहिए. अगर हमारी भलमनसाहत का पाकिस्तानी यह जवाब देंगे तो कब तक हम उनसे बेहतर रिश्तों की उम्मीद करते रहेंगे?
सोमवार, 26 जुलाई 2010
बी जे पी की इतनी आलोचना क्यूँ होती है?
हिंदी ब्लॉगर जगत के प्रबुद्ध लोग अपनी बुद्धि लगाएं इसके पहले ही साफ़ कर दूं कि ना तो मैं बी जे पी का समर्थक हूँ और ना कांग्रेस का। बी जे पी की आलोचना होती है तो सही ही होती है, उनके 'सुकर्मों' का यही फल मिलना भी चाहिए। अभी ज्यादा विस्तार में जा कर हर एक मुद्दे की विवेचना नहीं करना चाहता, लेकिन बी जे पी की हाल की हरकतों, खासकर झारखंड, कर्नाटक और गुजरात के मुद्दों पर केंद्रीय नेतृत्व के रुख से कोई ज्यादा उम्मीदें नहीं जगतीं कि सरकार बनाने के बाद वो देश का कायाकल्प कर देंगे!
इस पोस्ट का मूल विषय ये है भी नहीं। बी जे पी की आलोचना कई बार सरकार को कठिन मुद्दों पर भी ठीक से ना घेर पाने की वजह से हुई है। आतंरिक कलह इसका एक कारण है, लेकिन दूसरा कारण भी ध्यान में रखना चाहिए। विपक्ष सरकार को तभी घेर सकता है जब वो एकजुट हो। बी जे पी की अगुवाई में विपक्ष का एकजुट होना लगभग असंभव है। मंहगाई के मुद्दे पर भारत बंद करने सारी पार्टियां आ ज़रूर गयी थीं, पर अगले ही दिन सब में क्रेडिट लेने की होड़ भी लग गयी थी ! बी जे पी अपनी विचारधारा की वजह से अलग पड़ जाती है तो इसमें पूरे विपक्ष की गलती है, सिर्फ बी जे पी को दोष देना गलत होगा।
दूसरी बात, राष्ट्रीय मीडिया अधिकतर सिर्फ कांग्रेस और बी जे पी को ही कवर करता है। कांग्रेस की आलोचना, सरकार की आलोचना के खाते में चली जाती है! दिग्विजय सिंह जब चिदंबरम पर कटाक्ष करते हैं तो ये कांग्रेस के अंतर्कलह नहीं, 'सरकार के अंतर्विरोध' होते हैं। वैसे भी चाटुकारों की इस जमात में जगनमोहन रेड्डी जैसे ज्यादा पात्र हैं नहीं। मैडम और राजकुमार तो युधिष्ठिर के रथ पर सवार हैं जो भूमि से २ इंच ऊपर चलता है। उनके बारे में कोई कुछ लिखता नहीं, क्यूँ कि शायद कोई ख़ास ज्यादा जानता ही नहीं, और जानकर न लिखने की वजह वो है जो मैं सोचता हूँ.
कई लोग इसमें 'स्यूडो सेकुलरिज्म' और 'राष्ट्रवाद' जैसे बड़े बड़े कारण खोजेंगे पर मुझे तो यही लगता है, कि वैसे भी सरकार के विरोध में मीडिया ज्यादा बोलता नहीं। याद कीजिये कि इसी मीडिया ने 'इंडिया शाइनिंग' जैसे विज्ञापन के आधार पर दोबर वाजपायी सरकार बनने की भविष्यवाणी कर दी थी.तब ये बी जे पी के समर्थन में कुछ भी बोलते थे , आज काँग्रेस के समर्थन में बोलते हैं. इसलिए बी जे पी की डगर थोड़ी और मुश्किल हो गई लगती है, लेकिन मीडिया की आलोचना, मत दाताओं के मन पर कितना प्रभाव डाल पाती है, ये देखने वाली बात होगी!
इस पोस्ट का मूल विषय ये है भी नहीं। बी जे पी की आलोचना कई बार सरकार को कठिन मुद्दों पर भी ठीक से ना घेर पाने की वजह से हुई है। आतंरिक कलह इसका एक कारण है, लेकिन दूसरा कारण भी ध्यान में रखना चाहिए। विपक्ष सरकार को तभी घेर सकता है जब वो एकजुट हो। बी जे पी की अगुवाई में विपक्ष का एकजुट होना लगभग असंभव है। मंहगाई के मुद्दे पर भारत बंद करने सारी पार्टियां आ ज़रूर गयी थीं, पर अगले ही दिन सब में क्रेडिट लेने की होड़ भी लग गयी थी ! बी जे पी अपनी विचारधारा की वजह से अलग पड़ जाती है तो इसमें पूरे विपक्ष की गलती है, सिर्फ बी जे पी को दोष देना गलत होगा।
दूसरी बात, राष्ट्रीय मीडिया अधिकतर सिर्फ कांग्रेस और बी जे पी को ही कवर करता है। कांग्रेस की आलोचना, सरकार की आलोचना के खाते में चली जाती है! दिग्विजय सिंह जब चिदंबरम पर कटाक्ष करते हैं तो ये कांग्रेस के अंतर्कलह नहीं, 'सरकार के अंतर्विरोध' होते हैं। वैसे भी चाटुकारों की इस जमात में जगनमोहन रेड्डी जैसे ज्यादा पात्र हैं नहीं। मैडम और राजकुमार तो युधिष्ठिर के रथ पर सवार हैं जो भूमि से २ इंच ऊपर चलता है। उनके बारे में कोई कुछ लिखता नहीं, क्यूँ कि शायद कोई ख़ास ज्यादा जानता ही नहीं, और जानकर न लिखने की वजह वो है जो मैं सोचता हूँ.
कई लोग इसमें 'स्यूडो सेकुलरिज्म' और 'राष्ट्रवाद' जैसे बड़े बड़े कारण खोजेंगे पर मुझे तो यही लगता है, कि वैसे भी सरकार के विरोध में मीडिया ज्यादा बोलता नहीं। याद कीजिये कि इसी मीडिया ने 'इंडिया शाइनिंग' जैसे विज्ञापन के आधार पर दोबर वाजपायी सरकार बनने की भविष्यवाणी कर दी थी.तब ये बी जे पी के समर्थन में कुछ भी बोलते थे , आज काँग्रेस के समर्थन में बोलते हैं. इसलिए बी जे पी की डगर थोड़ी और मुश्किल हो गई लगती है, लेकिन मीडिया की आलोचना, मत दाताओं के मन पर कितना प्रभाव डाल पाती है, ये देखने वाली बात होगी!
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