शनिवार, 18 अप्रैल 2020

मेरी मूवी लिस्ट: ग़ैर-हिंदी भाषाओं की ५ लव स्टोरीज़

सिनेमा। हर उस आत्मपरक यानि सब्जेक्टिव विधा की तरह है जिसमें दो लोग भी अगर किसी एक चीज़ पर सहमत हो जाएं तो बड़ी बात! तो दी लल्लनटॉप की लिस्ट में दो फ़िल्मों के नाम देख कर जब हमने आपत्ति ज़ाहिर की तो लल्लनटॉप के भाई साहब ने कहा कि जी डेमोक्रेसी है, ये उनकी लिस्ट है, आप अपनी बना लो!

तो जी इस प्रवचन का लब्बोलुआब ये, कि हाज़िर हैं मेरी पसंदीदा ग़ैर-हिंदी भाषाओं की पिछले 5 सालों में रिलीज़ हुई 5 प्रेम कहानियाँ:

1. कुम्बलांगी नाइट्स (मलयालम, 2019)

कहानी घूमती है चार भाइयों, साजी, बॉनी, बॉबी और फ्रैंकी, के इर्द गिर्द. फ्रैंकी सबसे छोटा है और फुटबॉल खेलता है. भाइयों की आपस में बिलकुल नहीं बनती है. घर में माँ-बाप हैं नहीं और उनकी आर्थिक हालत भी ज़्यादा अच्छी नहीं है. बॉबी को प्यार हो जाता है बेबी से जो अपनी माँ के साथ अपनी दीदी और जीजा के साथ उनके घर में रहती है और टूर गाइड का काम करती है. बेबी से शादी करने के लिए बॉबी भी आवारागर्दी छोड़ कर नौकरी करना शुरू कर देता है और साजी उनके रिश्ते की बात करने बेबी के जीजा के पास भी जाता है, पर फिर कुछ ऐसा होता है कि सारे भाई अपने गिले-शिक़वे भुला कर एक साथ आ जाते हैं!

डायरेक्टर: मधु सी नारायणन. बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म. इसके पहले सिर्फ एक फिल्म में असिस्टेंट रहे थे. मलयालम फिल्मों के सुपरस्टार और इस फिल्म में विलेन के किरदार में काम कर रहे फ़हाद फ़ासिल इस फिल्म के सह-निर्माता भी हैं.

कहाँ देखें: अमेज़न प्राइम वीडियो




2. ओ कादल कनमनी (तमिल, 2015)

आदित्य एक वीडियो गेम डेवलपर है और अमेरिका जाने के ख्वाब रखता है. उसको मिलती है तारा जो एक वास्तु-कला (आर्किटेक्चर) की छात्रा है और पेरिस में पढ़ना चाहती है. दोनों को प्यार हो जाता है, पर शादी वगैरह में दोनों को कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है तो जब तक उनके सपने उन्हें अलग अलग राहों पर ना ले जाएं तब तक वो साथ रहेंगे और उसके बाद ओके टाटा बाय बाय. इसी विचारधारा के साथ वो लिव इन में रहने लगते हैं. पर उनके बूढ़े मकान मालिक दम्पति के बीच का प्यार देख कर उनका मन बदल जाता है.

डायरेक्टर: मणिरत्नम. 2000 में आयी 'अलाइ पायुथे' के बाद उनकी पहली शुद्ध देसी रोमांटिक फ़िल्म! 2 साल बाद आयी 'ओके जानू' देख कर ऐसा लगेगा जैसे किसी बेस्ट-सेलर किताब की चौराहे पर मिलने वाली फोटोकॉपी.

कहाँ देखें: हॉटस्टार. वीआईपी या प्रीमियम सब्सक्रिप्शन की आवश्यकता नहीं.



3. 96 (तमिल, 2018)

दसवीं कक्षा में एक दूसरे को दिल दे चुके राम और जानकी (जानू) 22 साल बाद स्कूल के रीयूनियन में मिलते हैं और वो भी सिर्फ एक रात के लिए. 22 साल पुराने  पहले प्यार की यादों के साथ ही निकल कर आती हैं बहुत सारी बातें. इससे ज़्यादा इस फिल्म की कहानी के बारे में बता पाना, बिना स्पॉइलर दिए, संभव नहीं!

डायरेक्टर: सी प्रेम कुमार. बतौर निर्देशक इनकी भी पहली फ़िल्म. इसके पहले छायाकार (सिनेमेटोग्राफर) थे. फ़िल्म की नायिका का नाम प्रख्यात गायिका जानकी देवी के नाम पर रखा गया है और वो जानकी अम्मा के गीत ही गाती भी है.

कहाँ देखें: सन नेक्स्ट, जिओ सिनेमा. यूट्यूब पर किराये पर या खरीद कर देख सकते हैं




4. केयर ऑफ़ कांचरापलेम (तेलुगु, 2018)

चार प्रेम कहानियाँ, जीवन के अलग अलग पड़ावों पर. पांचवीं में पढ़ने वाले सुंदरम को प्यार होता है अपनी क्लास की सुनीता से, 23 साल के जोसेफ़ को भार्गवी से, 31 वर्षीय गड्डम को सलीमा से और 49 साल के ऑफिस अटेंडेंट राजू को अपनी 42 वर्षीय अधिकारी राधा मैडम से. राजू इस उम्र में भी अविवाहित है और गाँव के लोगों के ताने और उपहास झेलने का आदी भी. वहीं राधा मैडम विधवा हैं और उनकी एक 20 साल की बेटी भी है. हर प्रेम कहानी में एक न एक खलनायक है. कहीं धर्म, कहीं आयु और कहीं समाज. लेकिन अंत में सारी कहानियाँ आ कर मिलती हैं एक बिंदु पर!

डायरेक्टर: वेंकटेश माहा. बतौर निर्देशक ही नहीं बतौर लेखक भी इनकी पहली फ़िल्म. इसके पहले फ़िल्म जगत से कोई नाता नहीं! विशाखापट्नम के पास कांचरापलेम कस्बे में ही शूटिंग हुई और सभी (जी हाँ, सभी) कलाकार इसी जगह के निवासी हैं और किसी को भी पहले अभिनय का कोई तजुर्बा नहीं था. फ़िल्म को 'प्रेजेंट' किया था अपने भल्लालदेवा यानि राना दग्गुबाती ने.

कहाँ देखें: नेटफ़्लिक्स 




5. फ़िदा (तेलुगु, 2017)

अमेरिका के एनआरआई राजू और उसका भाई वरुण भारत आते हैं राजू की शादी के लिए रेणुका को देखने. रेणुका की तेज़ तर्रार बहन और अपने पिता की बहुत दुलारी बेटी है भानुमती। एक तरफ राजू और रेणुका की शादी की रस्में आगे बढ़ती हैं तो दूसरी तरफ वरुण और भानुमती की दोस्ती, जो धीरे धीरे प्यार में बदलने लगती है. पर भानु अपने पिता को छोड़ कर अमेरिका नहीं जाना चाहती और जब उसे पता चलता है कि वरुण भारत नहीं आना चाहता तो प्यार में दरार आ जाती है. अब ये दरार कैसे भरती है, वरुण और भानु अपने बीच के फासलों को कैसे ख़त्म करते हैं, यही इस फ़िल्म की कहानी है.

डायरेक्टर: शेखर कम्मुला. तेलुगु सिनेमा का बहुत बड़ा नाम. ये फिल्म मलयालम और तमिल में ('भानुमती') भी डब हुई थी.

कहाँ देखें: अमेज़न प्राइम वीडियो, हॉटस्टार, व्यू सेलेक्ट


 एक आखिरी बात. इन सभी फिल्मों का संगीत बेहद शानदार है. भाषा नहीं भी समझते हों तो भी सुनिए क्यूंकि संगीत की कोई भाषा तो होती नहीं ना!

सोमवार, 16 दिसंबर 2019

ये कहाँ आ गए हम

(रितुपर्णा चटर्जी के ट्वीट्स का हिंदी अनुवाद: https://twitter.com/MasalaBai/status/1206386825838772226)

ये दिन अचानक नहीं आया, धीरे धीरे नींव रखी गयी है. उनको ये पता है कि जनता की नैतिकता बहुत लचीली है और इसीलिये हर दिन थोड़ा थोड़ा करके, जनता को आज़माया गया कि वो बिना टूटे कितना बर्दाश्त कर सकती है. उन्होंने छात्रों की छवि देश के दुश्मनों जैसी बना दी और आपने तालियां बजायीं।

जब पहली बार उन्होंने टीवी चैनलों को अपना मुखपत्र और ऐंकर्स को अपनी कठपुतली बनाया तब आपने मीम्स बनाये. जब उन्होंने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को रात के अँधेरे में घर से गैर कानूनी तरीके से उठा कर जेल में ठूंस दिया और उनके गुर्गों ने उन्हें आतंकवादी करार दे दिया तब आपने उनका यकीन कर लिया.

जब पहली बार उन्होंने हमसे हमारा पैसा छीन लिया तब हमने अखबार के पन्ने इस कदम को 'मास्टरस्ट्रोक' साबित करने में रंग दिए और सबको बड़े गर्व से बताया कि हम तो 'कैश' का इस्तेमाल करते ही नहीं क्यूंकि हम कोई छोटे व्यापारी या दुकानदार नहीं थे जिसके लिए ये जीने मरने की बात थी!

जब पहली बार उन्होंने सिनेमा घरों में घुस कर अपनी 'आहत भावनाओं' का हवाला दे कर तोड़ फोड़ की, आपने उन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी। जब पहली बार उन्होंने किसी को राष्ट्र गान के लिए खड़े नहीं होने पर मारा तब आपको लगा ऐसे 'देशद्रोहियों' के साथ यही सलूक होना चाहिए.

पानी नाक तक आ गया था जब पहली बार उन्होंने आतंकवाद की एक अभियुक्त को चुनाव में खड़ा कर दिया मगर तब आपने पूछा कि 'सबूत कहाँ है?'. और जब पहली बार उन्होंने किसी को सरेआम पीट पीट कर मार डाला तब आप को 'दुःख तो बहुत हुआ' लेकिन गऊ माता के नाम पर आपने ये सब स्वीकार कर लिया!

जब पहली बार उन्होंने इंटरनेट बंद किया, सेना को सड़कों पर ले आए, एक आदमी को जीप पर बाँध कर घुमाया तब तक आपको भीड़तंत्र की आदत पड़ चुकी थी और आपको इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा. आपके मन में यही आया कि 'जो लोग देश से प्यार नहीं कर सकते उनके साथ यही होना चाहिए'

जब पहली बार उन्होंने आपका बायोमीट्रिक डाटा लेना और सारे सवालों को दरकिनार करना शुरू किया तब तक आप उनके आज्ञाकारी मातहत बन चुके थे. 'फेसबुक को डाटा दे सकते हैं तो देश को क्यों नहीं?' आपने ये नहीं सोचा कि देश और सरकार में फर्क होता है पर अब तक ये सोचने के लिए बहुत देर हो चुकी थी!

जब सत्ताधारी पार्टी के लोगों पर हत्या और बलात्कार के आरोप लगे, आपको कोई फर्क नहीं पड़ा। पड़ता भी क्यों, पीड़ित आपके परिवार का कोई सदस्य थोड़े ही था.

जब पहली बार उन्होंने स्कूल की किताबों में बदलाव किये, हज़ारों करोड़ों की मूर्तियां बनायी, शहरों के नाम बदले आपके कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। आपने तो 'विकास' के लिए वोट दिया था ना, ये सब तो चलता है.

एक बात समझ लीजिये कि आपकी ये संवेदनहीनता बहुत ही चालाकी और सावधानी से तैयार की गयी है, और बाकी सब कुछ अपने आप हो रहा है!

सोमवार, 5 नवंबर 2018

पटाख़े चलाइये, हिन्दू धर्म बचाइये

दीवाली आने वाली है. इसके पहले कि कोई आपको बोले कि पटाख़े मत चलाओ मैंने सोचा आपको पहले ही सावधान कर दूँ कि ऐसे एंटी-नेशनल लोगों के बहकावे में मत आइयेगा। 

अभी आप पूछेंगे ये एंटी-नेशनल कैसे हो गये? तो जी मेरी मर्ज़ी।अभी एंटी-नेशनल बनने के लिए कोई डिग्री थोड़ी न चाहिये (वैसे अगर पीएचडी है और वो भी 'ऑर्टस' सब्जेक्ट्स में तो एक्स्ट्रा वेटेज मिलेगा और अगर आप जे.एन.यू. से हैं तो बस माथे पे लिखवाना बाकी है). 

मुद्दे पे वापिस आते हैं. तो जी दीवाली पे पटाख़े चलाना हमारी परंपरा है. अभी कोई वाल्मीकि या तुलसीदास बोलेगा कि दीपावली पर भगवान् राम के आने पर लोगों ने दिए जलाए तो इसका ये मतलब थोड़े ही है कि पटाख़े नहीं चलाये।ये कुम्हारों द्वारा फैलाया गया झूठ है. हम भी दिए मोमबत्ती जलाते हैं कि नहीं जलाते मित्रों। फुलझड़ी जलाने के लिए कोई तो आग का सोर्स चाहिए ना. अयोध्या वालों ने जो पटाख़े चलाये थे कि विभीषण ने मन ही मन सोचा था कि ठीक है अनंत काल तक मेरा नाम बदनाम हो गया पर इन लोगों के साथ दोस्ती हो गयी. अगर कहीं राम का दिमाग फिर जाता और यही पटाख़े वो लंका में चला देते तो लंका की लंका लग जाती!

और जो लोग कहते हैं कि पटाखों का आविष्कार चीन में हुआ ऐसे लोगों को तो बस पाकिस्तान भेज देना चाहिए। रामानन्द सागर की रामायण में वो लड़ाई वाले सीन याद हैं कि भूल गए? एक तरफ से लक्ष्मण तीर चलाते थे, दूसरी तरफ से मेघनाद। कैसी मनोहर आतिशबाज़ी निकलती थी दोनों से। वाह वाह. ये चीन वाले क्या खा के ऐसी आतिशबाज़ी का अविष्कार करेंगे!
और सारी दुनिया को पता है कि रामानन्द सागर की रामायण ही असली रामायण है तो अगर उसमें दिखाया था तो सच ही होगा ना। 

अब जो लोग बोलते हैं कि प्रदूषण होगा तो ऐसी कौन सी आफत आ रही है प्रदूषण से. आ भी रही है तो आने दो! कोई बोल रहा था कि डॉक्टर लोग बोले कि एक पटाख़े से ५० सिगरेट के बराबर धुंआ शरीर में जाता है तो भाई इससे अच्छी बात कुछ हो सकती है क्या? ५ पैकेट का खर्चा बचा कि नहीं। अब बस किसी तरह पीने का भी इंतज़ाम हो जाता तो दिवाली के दिन धरती पर ही स्वर्ग का आनंद आ जाता! और जो लोग कहते हैं कि पटाखों में होने वाले केमिकल्स से छोटे बच्चों पर बुरा असर पड़ता है तो जी बुरा असर तो टीवी का भी पड़ता है. उसको भी बैन कर दें क्या? और अगर थोड़ा ज़्यादा बुरा असर पड़ भी गया और थोड़े बच्चे और बूढ़े एक दो साल जल्दी मर भी गए तो देश की जनसँख्या के लिए अच्छा ही है ना. कभी तो देश के लिए भी सोचा करो. हमेशा अपनी ही चिंता लगी रहती है!

और व्हाट्सऐप पर बुआ जी ने बताया है कि दिवाली के पटाखों की गंध और धुएं से डेंगू और चिकनगुनिया के मच्छर मर जाते हैं. लो जी लाइफ़ में और क्या चाहिये! आगे से ये आल आऊट और मार्टीन फेंक कर सोने से पहले बस एक सौ वाली लड़ी जलाइए और चैन से सोइये. पैसे बचाने में पटाखों के योगदान पर रिसर्च होनी चाहिए।

तो बस सुप्रीम कोर्ट की ऐसी तैसी करिये, २४ घंटे पटाख़े चलाइये। हिन्दू धर्म वैसे भी खतरे में है, पटाख़े चला कर धर्म का नाम रोशन कीजिये।   

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

दिलासा

भगवान विष्णु की आँख अभी लगी ही थी कि कानों में 'नारायण नारायण' की आवाज़ पड़ी.

माता लक्ष्मी से अभी इन्वेस्टमेंट को लेकर थोड़ी बहस हुई थी और भगवान का मूड थोड़ा खराब था. बात कुछ ख़ास नहीं थी, वही टिपिकल मेल एटीट्यूड। पत्नी इन्वेस्टमेंट बैंकर ही क्यों न हो, रुपये पैसे के मामले में पति उसे हमेशा गंवार ही समझता है. लक्ष्मी जी कह रही थीं कि आयल फ्यूचर में इन्वेस्ट करते हैं, 4 -5 साल भले ही लग जाएँ , अप्प्रीशिएट तो होगा ही. ये सारी एस यू वी कारें सोलर सेल पे तो चलने से रहीं। विष्णु जी गोल्ड बांड की दलील दे रहे थे. बस थोड़ी गरमा-गर्मी हो गई.

"अरे यार, 10 मिनट कोई चैन से बैठने नहीं दे सकता." विष्णु जी इस समय नारद के आने से थोड़े से इरिटेटेड से हुए. फिर सोचा कि चलो आने दो. थोड़ी गपशप हो जाएगी तो मूड फ्रेश हो जाएगा। थोड़ा स्टॉक्स वगैरह भी डिस्कस कर लूँगा।

"नारायण नारायण। प्रणाम प्रभु" नारद ने अभिवादन किया.

"आइये नारद. क्या समाचार लाये हैं?" भगवान ने "और सुनाओ " वाले अंदाज़ में कहा.

"प्रभु आपके ऊपर जो केस हुआ था..."

"मेरे ऊपर केस हुआ था??? कौन सा केस? नारद आज सुबह सुबह ही सोमरस पान कर लिया क्या?" भगवान उठ कर बैठ गए. शेष नाग ने भी आँखें और कान खोल लिए!

नारद को अचम्भा हुआ. पिछली बार आया था तब बताया तो था इनको कि सीता को त्यागने के मामले में बिहार में भगवान राम पर मुकदमा दर्ज़ हुआ है. लगता है आजकल प्रभु मेरी बातें ठीक से नहीं सुनते!

"भगवन, आपको स्मरण होगा कि मैं तो ब्रह्मचारी हूँ, सोमरस का पान तो दूर, दर्शन तक नहीं करता. आपको वसंत पंचमी वाले दिन बताया था ना कि भारत वर्ष के बिहार प्रांत में.."

भगवान को याद आ गया. "अरे हाँ हाँ , याद आया. अब फंक्शन वाले दिन ये सब बताओगे तो कहाँ याद रहेगा। खैर क्या हुआ उसका? अभी ये मत बोलना कि मुझे लेने के लिए धरती से दूत भेजे हैं"

नारद "हें हें" वाले स्वर में बोले, "नहीं प्रभु, भारत वर्ष में वकील भले ही कूढ़ मगज़ हों, न्यायाधीश थोड़े ठीक हैं. वो केस रद्द कर दिया गया है. किन्तु अब हनुमान जी को लेकर एक नयी समस्या उत्पन्न हो गयी है."

भगवान ने लम्बी साँस ली और "पका दिया यार" वाले स्वर में बोले "श्रीलंका वाले पहाड़ की चोरी का आरोप लगा रहे हैं क्या? जो है वो तो इन लोगों से संभलता है नहीं, जो नहीं है उसके लिए मरते रहते हैं "

"अरे नहीं प्रभु. श्रीलंका के साथ कोई समस्या नहीं है. उसके लिए तो बस बी.सी.सी.आई को एक टी-20 श्रंखला का आयोजन करना होता है और सारी समस्याएँ समाप्त हो जाती हैं. हनुमान जी पर सरकारी भूमि पर अवैध कब्ज़े का आरोप है"

शेषनाग को हनुमान से ख़ास प्यार नहीं था. कौन भगवान का ज़्यादा ख़ास है, इसको लेकर दोनों में ठनी रहती थी. ये खबर सुन कर उनके दिल को ठंडक मिली।

लेकिन भगवान चकरा गए. "अवैध कब्ज़ा? अर्थात अतिक्रमण? हनुमान ने कोई अखाड़ा वगैरह खोल दिया है क्या किसी एम.एल.ए. की ज़मीन पर? इन लोगों को कितना भी समझाओ कि शांति से मंदिर में रहो और चढ़ावे से पेट भरो लेकिन नहीं। सबको अपना 'पैशन फ़ॉलो' करना है. करो अब!"

नारद ने भगवान को अपसेट होते हुए देखा तो झट से सिचुएशन डिफ्यूज़ करने लगे. "नहीं प्रभु, हनुमान जी की कोई त्रुटि नहीं है. मंदिर ही सड़क के बीच में बना दिया गया है. वो बेचारे तो स्वयं ही वायु और ध्वनि प्रदूषण से त्रस्त हैं. प्रशासन ने उन्हें मंदिर छोड़ने का आदेश दिया है पर उनके नाम पर राजनीति करने वाले उन्हें ऐसा करने नहीं दे रहे."

भगवान को इस राजनीतिक दल के बारे में नारद पहले भी बता चुके थे लेकिन वो राजनीति में पड़ना नहीं चाहते थे. पहले ही धरती पर उनके नाम पर भीषण रूप से वीभत्स राजनीति चल रही थी. उन्हें डर था कि अगर उन्होंने जनता को समझाने की कोशिश की तो कहीं उन्हें भी वही नाम और विशेषण ना दे दिए जाएं जो विरोधियों को दिए जाते थे.


"अब ये कोर्ट कचहरी के विषयों में आप और हम क्या कर सकते हैं, नारद! हमें तो ऐसा लगने लगा है कि इस पूरे देश के विषय में अब हम कुछ भी करने में असमर्थ हो गए हैं. जाइए, हनुमान से कहियेगा कि चिंता न करें, कोई न कोई समाधान निकल ही आएगा।" ऐसा कहकर भगवान ने आखें मूँद लीं.

और नारद हनुमान जी को एक झूठा दिलासा देने चल दिए.

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

जहां पुराना हमेशा नया रहेगा

सिया के लिए 'पज़ल' गेम आया तो उसमें एक फोटो पोस्टबॉक्स और डाकिये की थी. अब अपनी ढाई साल की उम्र में बिटिया ने ना कभी पोस्टऑफिस देखा है और ना कभी खाकी वर्दी वाला डाकिया. हमेशा कुरियर वाले 'अंकल' ही आये हैं घर पे, जो डिब्बे दे के जाते हैं और हर डब्बा 'छिया का' होता है, अंदर वाला सामान चाहे जिसका भी हो!

यूं ही मन में विचार आया कि अरसा हो गया, किसी की चिट्ठी आये हुए, या किसी को चिट्ठी लिखे हुए. आख़िरी बार म्यूच्यूअल फंड कंपनियों को पत्र भेजा था, लिफ़ाफ़े में डाल कर, टिकट लगा कर. ये कहानी सिर्फ मेरी नहीं है, बहुतों की होगी. 

ईमेल के आने के बाद से लिफ़ाफ़ा और उसके अंदर का पत्र 'आउटडेटेड' हो गए, लेकिन इंटरनेट पर ईमेल की पहचान अभी भी वही लिफाफा है. गूगल पर 'email icon' सर्च किया तो ये इमेजेज़ आयीं:


ऐसी ही कुछ कहानी 'फ्लॉपी' की है. आज के बच्चे तो क्या, दस-बारह साल के बच्चे भी शायद ही फ्लॉपी के बारे में जानते हों (कंप्यूटर के इतिहास में शायद पढ़ाया जाता हो तो हो) लेकिन हर सॉफ्टवेयर और साइट पर 'सेव' यानी 'फ्लॉपी'. 

और पता क्या, हर गुज़रता हुआ दिन ऐसी कई और रोज़मर्रा की चीज़ों को सिर्फ 'चिन्ह' बनने के करीब लाता जा रहा है. शॉपिंग कार्ट जो कुछ साल में शायद सिर्फ इ-कॉमर्स साइट पे दिखें, लैंडलाइन फोन जो अभी ही इंटरनेट पर कॉल का प्रतीक है घर और ऑफिस से गायब हो जाए, ताले और चाभी घर की सुरक्षा के बजाये इंटरनेट पर सुरक्षा के चिन्ह हों, पर्स और वॉलेट का काम पैसे रखने के बजाये ऑनलाइन वॉलेट की फोटो होना हो. 

सिर्फ कयास ही हैं. पता नहीं और क्या क्या बदल जाएगा. लेकिन इस बदलाव के दौर में भी ये गुज़रे ज़माने की चीज़ें चिन्ह बन कर ही सही, हमें उस ज़माने की याद तो दिलाती ही रहेंगी!

मंगलवार, 30 जून 2015

कुछ भूले कुछ याद रहा

अरसा हो गया कुछ लिखे. हिंदी में तो और भी ज़्यादा.

कभी कभी अपने ही पुराने ब्लॉग पढता हूँ, अच्छे भी लगते हैं. सोचता हूँ फिर से कुछ लिखूं पर लिखा नहीं जाता. पता नहीं क्यूं.

खुद को धोखा भी देना मुश्किल नहीं होता.

"समय नहीं मिलता"
"ऑफिस में बहुत काम है"
"बेटी छोटी है, बैठने ही नहीं देती"

और भी तमाम ऐसे बहाने. सारी ज़िन्दगी ही बहानों से भर गयी है. हर हार के लिए, एक बहाना तैयार मिलेगा. अक्सर सोचता हूँ, कि वो सब जो खो दिया है, वापस लाऊंगा पर क्या और कैसे, इन सवालों के जवाब ही नहीं होते.

और वास्तव में विकर्षणों की कमी नहीं है पर विकर्षित होना तो अपनी कमज़ोरी है.

कुछ तो करना पड़ेगा। बचपन में अपनी लिखी कविताओं की एक डायरी जला दी थी, पता नहीं किस धुन में आ कर. इस ब्लॉग को तो जला नहीं सकता, लेकिन इसको भूल जाना वैसा ही कुछ हो जाएगा!

अपने आप से ये वादा करता हूँ. फिर से लिखूंगा. कई बार ऐसा होगा जब शब्द दिमाग से उँगलियों तक आने से मना कर देंगे पर फिर भी कुछ न कुछ तो लिखूंगा ही. 

सोमवार, 28 जुलाई 2014

कम्यूनल

कल तक सबकी थी,
आज ईद उनकी,
दीवाली हमारी हो गयी. 
एक दूसरे को शक़ की नज़र से 
देखने की बीमारी हो गयी। 

कल तक एक धड़कन थी 
एक जान थी, 
एक दिल था, 
आज बस भीड़ के दो दल हो गए. 
कोई माने या ना माने 
सच तो यही है कि 
हम सब कम्यूनल हो गए!