अभी कुछ ही दिन पहले ख़बर पढी थी कि संसद में मंहगाई पर विवाद के समय सदन लगभग खाली था, और बाहर सारी पार्टियां आम आदमी की हितैषी बनी चक्का जाम करने में जुटी थीं । यह और बात कि उनकी इस ड्रामेबाजी से आम आदमी को सिर्फ़ परेशानी ही हुई। कौन सी नयी बात है!
पर अभी IPL में चीअरलीडर्स के कपड़ों पर बहस करने में कोई नेता किसी से पीछे नहीं रहा। जो बात कोई मुद्दा ही नहीं थी अचानक पहले पन्ने की सुर्खी बन गयी! आजकल नेताओं का टीवी प्रेम किसी से छुपा नहीं है, सदन में जाकर सवाल जवाब करें न करें, कैबिनेट कमेटी की बैठक में जाएं न जाएं पर टीवी स्टूडियो में बैठ कर बहस करवा लो! २४ घंटे तैयार मिलेंगे। रवि शंकर प्रसाद, राजीव प्रताप रूडी, गुरुदास दास दासगुप्ता वगैरह ऐसे ही कुछ टीवी नेता हैं।
नेपाल में माओवादी सरकार बना रहे हैं, त्रिपुरा में फ़िर से बर्ड फ्लू फैलने के आसार हैं, तेल के दाम रोज़ नयी ऊँचाई छू रहे हैं, दिल्ली में BRTS परियोजना बुरी तरह विफल हो गयी, भोजन संकट मुंह बाए खड़ा है, हॉकी की दुर्दशा है न के पी एस गिल इस्तीफा देने को तैयार नहीं हैं और न जाने क्या क्या समस्याएं सामने खड़ी हैं, पर हमारे महान नेताओं के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय हैं चीअर लीडर्स।
अब कोई इनसे यह पूछो कि यह लोग कुछ काम भी करते हैं या बस IPL के मैच ही देखते हैं! लेकिन सीधी सी बात यह समझो कि किसी गंभीर मुद्दे पे सरकार को घेरने से चर्चा तो मिलेगी नहीं, इस तरह के घटिया मुद्दों पर किसी टीवी कैमरे के आगे २ मिनट नारा लगा दिया तो हर समाचार चैनल पर सुर्खियों में आ ही जाएंगे। वैसे भी मीडिया को गंभीर मसलों को भी मिर्च मसाला लगाने की आदत हो गयी है , और इस मुद्दे पर तो ख़बर के बहाने काफी कुछ दिखाने सुनाने को मिलेगा!
और देखने को जनता तो बैठी ही है!
रविवार, 27 अप्रैल 2008
बुधवार, 12 मार्च 2008
कृषि माने क्रिकेट?
(आलोक पुराणिक का बड़ा पंखा (फैन!) हूँ और यह लेख उनको समर्पित!)
जबसे शाहरुख़ खान ५ करोड़ के सपने दिखा के पांचवी क्लास के सवाल पूछने लगे हैं तबसे पांचवी क्लास का रुतबा बहुत बढ़ गया है। स्कूल में बड़ी कक्षाओं के बच्चों से पूछते हैं, क्या तीर मार लिया तुमने पांचवी पास करके।हमें देखो बिना पी आर वालों को पैसे दिए हमारा इतना चर्चा है! मुझे ऐसी ही पांचवी कक्षा में बच्चों को कृषि के बारे में बताना है।
मैं कहता हूँ बच्चों कृषि का इस देश में काफ़ी महत्त्व है और कृषक काफ़ी महत्वपूर्ण व्यक्ति। मैं बच्चों को यह नहीं बता रहा कि इस महत्वपूर्ण व्यक्ति का महत्त्व सिर्फ़ चुनावी वर्ष में ही देश को पता चलता है!
एक बच्चा सवाल पूछ रहा है "सर यह कृषि क्या क्रिकेट का हिन्दी नाम है? क्र से क्रिकेट, क्र से कृषि"। बच्चा अपनी बुद्धिमानी पर काफ़ी खुश हो रहा है। "नहीं नहीं कृषि का क्रिकेट से कुछ लेना देना नहीं है" मैं कहता हूँ। दूसरा बच्चा खड़ा हो गया है "लेना देना कैसे नहीं है सर। जी. के वाले सर ने बताया था कि कृषि मंत्री कोई शरद पवार हैं पर शरद पवार तो क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन हैं तो क्या क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन को हिन्दी में कृषि मंत्री कहते हैं?"
"नहीं नहीं बच्चों ऐसा नहीं है। जो लोग कृषि का काम करते हैं, उनको कृषक कहा जाता है और वो लोग खेत यानी फील्ड्स में फसल उगाते हैं। यह काफ़ी मेहनत का काम है !" मैं समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। पर बच्चे सुन ही नहीं रहे हैं।
"क्या बात कर रहे हैं सर! फील्ड में तो क्रिकेट खेली जाती है। धोनी और युवराज दीपिका की फील्डिंग करते हैं। और दोनों ही कामों में काफ़ी मेहनत लगती है !" बाकी बच्चे इस बच्चे की बात पर हंस रहे हैं।
मैं ज़रा नाराज़ होने की एक्टिंग करता हूँ और बच्चे चुप हो जाते हैं। "कृषि मंत्री शरद पवार क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन ज़रूर हैं लेकिन वो कृषि के लिए काफ़ी कुछ करते हैं। सरकार से कृषि के लिए पैसे दिलवाते हैं" मैं बच्चों के मन में शरद पवार की छवि बदलने की कोशिश कर रहा हूँ।
"तो क्या सर वो "कृषक ऑफ़ सीज़न" या "कृषक ऑफ़ मंथ" जैसे अवार्ड्स भी देते हैं? और बेस्ट कृषक को मर्सिडीज़ कार?" एक बच्चा पूछ रहा है। यह बच्चे मेरी बात का सार नहीं समझ रहे!
एक लड़की सवाल पूछ रही है "सर कृषक यानी किसान?" मैं खुश हो गया हूँ, कम से कम किसी को समझ में आयी मेरी बातें! "बिल्कुल सही"। "तो सर जब इतने किसान आत्महत्या कर रहे हैं देश में, तो कृषि मंत्री को क्रिकेट के लिए समय कहाँ से मिल जाता है?"
अब मैं निरुत्तर हो गया हूँ।
जबसे शाहरुख़ खान ५ करोड़ के सपने दिखा के पांचवी क्लास के सवाल पूछने लगे हैं तबसे पांचवी क्लास का रुतबा बहुत बढ़ गया है। स्कूल में बड़ी कक्षाओं के बच्चों से पूछते हैं, क्या तीर मार लिया तुमने पांचवी पास करके।हमें देखो बिना पी आर वालों को पैसे दिए हमारा इतना चर्चा है! मुझे ऐसी ही पांचवी कक्षा में बच्चों को कृषि के बारे में बताना है।
मैं कहता हूँ बच्चों कृषि का इस देश में काफ़ी महत्त्व है और कृषक काफ़ी महत्वपूर्ण व्यक्ति। मैं बच्चों को यह नहीं बता रहा कि इस महत्वपूर्ण व्यक्ति का महत्त्व सिर्फ़ चुनावी वर्ष में ही देश को पता चलता है!
एक बच्चा सवाल पूछ रहा है "सर यह कृषि क्या क्रिकेट का हिन्दी नाम है? क्र से क्रिकेट, क्र से कृषि"। बच्चा अपनी बुद्धिमानी पर काफ़ी खुश हो रहा है। "नहीं नहीं कृषि का क्रिकेट से कुछ लेना देना नहीं है" मैं कहता हूँ। दूसरा बच्चा खड़ा हो गया है "लेना देना कैसे नहीं है सर। जी. के वाले सर ने बताया था कि कृषि मंत्री कोई शरद पवार हैं पर शरद पवार तो क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन हैं तो क्या क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन को हिन्दी में कृषि मंत्री कहते हैं?"
"नहीं नहीं बच्चों ऐसा नहीं है। जो लोग कृषि का काम करते हैं, उनको कृषक कहा जाता है और वो लोग खेत यानी फील्ड्स में फसल उगाते हैं। यह काफ़ी मेहनत का काम है !" मैं समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। पर बच्चे सुन ही नहीं रहे हैं।
"क्या बात कर रहे हैं सर! फील्ड में तो क्रिकेट खेली जाती है। धोनी और युवराज दीपिका की फील्डिंग करते हैं। और दोनों ही कामों में काफ़ी मेहनत लगती है !" बाकी बच्चे इस बच्चे की बात पर हंस रहे हैं।
मैं ज़रा नाराज़ होने की एक्टिंग करता हूँ और बच्चे चुप हो जाते हैं। "कृषि मंत्री शरद पवार क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन ज़रूर हैं लेकिन वो कृषि के लिए काफ़ी कुछ करते हैं। सरकार से कृषि के लिए पैसे दिलवाते हैं" मैं बच्चों के मन में शरद पवार की छवि बदलने की कोशिश कर रहा हूँ।
"तो क्या सर वो "कृषक ऑफ़ सीज़न" या "कृषक ऑफ़ मंथ" जैसे अवार्ड्स भी देते हैं? और बेस्ट कृषक को मर्सिडीज़ कार?" एक बच्चा पूछ रहा है। यह बच्चे मेरी बात का सार नहीं समझ रहे!
एक लड़की सवाल पूछ रही है "सर कृषक यानी किसान?" मैं खुश हो गया हूँ, कम से कम किसी को समझ में आयी मेरी बातें! "बिल्कुल सही"। "तो सर जब इतने किसान आत्महत्या कर रहे हैं देश में, तो कृषि मंत्री को क्रिकेट के लिए समय कहाँ से मिल जाता है?"
अब मैं निरुत्तर हो गया हूँ।
शनिवार, 8 मार्च 2008
अब कीजिये ऑफलाइन ब्लॉगिंग!
ऑफलाइन ब्लॉगिंग है क्या? बहुत साधारण सी चीज़ है, जैसे अभी आप किसी ईमेल सॉफ्टवेयर जैसे आउटलुक या मोजिला Thunderbird में अपनी मेल कभी भी लिख कर उसे ड्राफ्ट के रूप में सेव कर सकते हैं और जब चाहे उसे भेज सकते हैं बिल्कुल वैसे ही ये ऑफलाइन ब्लॉगिंग सॉफ्टवेयर आपको सुविधा देता है कि आप कभी भी लिखिए और जब चाहें उसे पोस्ट कर दीजिये। अब अगर आप पूछ रहे हैं कि इसमे ख़ास बात क्या है, यह तो आप नोट पैड या वर्ड पैड में भी लिख सकते हैं और जब चाहे उसे अपनी ब्लॉग साईट पर पोस्ट कर सकते हैं, तो ज़रा धैर्य रखिये, अभी बताता हूँ।
आप अपने ब्लॉग को एक बार रजिस्टर कर दीजिये यानी ब्लॉग का URL, RSS फीड का URL और लोगिन की जानकारियाँ दीजिये और आपके ब्लॉग की सारी सेटिंग यह टूल अपने आप उठा लेंगे। यानी कि जब आप लिखें तो उसी समय देख सकते हैं कि साईट पर जाने के बाद आपको लेख कैसा दिखेगा। यही नहीं, आपके टैग्स की सूची भी आपको उपलब्ध होगी। आपको चाहें तो Technorati टैग्स भी लगा सकते है, किसी पिंग सर्वर को पिंग करने के निर्देश दे सकते हैं और वो सब कुछ कर सकते हैं जो आपको सीधे साईट पर पोस्ट करते समय करते हैं।
माइक्रोसॉफ्ट का विन्डोज़ लाइव राइटर और मोजिला का स्क्राईब फायर ऐसे ही दो टूल हैं। रजिस्टर करने के लिए आपको इंटरनेट से जुड़ा होना आवश्यक है जिससे कि आपके ब्लॉग की जानकारियाँ उठाई जा सकें। लाइव राइटर तो इंस्टाल करने के लिए भी यह ज़रूरी है!
स्क्राईब फायर में आपको अलग से कुछ इंस्टाल नहीं करना पड़ता और क्यूंकि यह फायरफॉक्स के लिए प्लगिन है, किसी भी ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलता है। लाइव राइटर में कुछ सुविधाएं अधिक हो सकती हैं, लेकिन यह सिर्फ़ इंटरनेट एक्सप्लोरर पर ही काम करता है और सिर्फ़ विन्डोज़ के लिए उपलब्ध है।
तो अब कभी भी, कहीं भी लिखिए और जब चाहे पोस्ट कीजिये!
आप अपने ब्लॉग को एक बार रजिस्टर कर दीजिये यानी ब्लॉग का URL, RSS फीड का URL और लोगिन की जानकारियाँ दीजिये और आपके ब्लॉग की सारी सेटिंग यह टूल अपने आप उठा लेंगे। यानी कि जब आप लिखें तो उसी समय देख सकते हैं कि साईट पर जाने के बाद आपको लेख कैसा दिखेगा। यही नहीं, आपके टैग्स की सूची भी आपको उपलब्ध होगी। आपको चाहें तो Technorati टैग्स भी लगा सकते है, किसी पिंग सर्वर को पिंग करने के निर्देश दे सकते हैं और वो सब कुछ कर सकते हैं जो आपको सीधे साईट पर पोस्ट करते समय करते हैं।
माइक्रोसॉफ्ट का विन्डोज़ लाइव राइटर और मोजिला का स्क्राईब फायर ऐसे ही दो टूल हैं। रजिस्टर करने के लिए आपको इंटरनेट से जुड़ा होना आवश्यक है जिससे कि आपके ब्लॉग की जानकारियाँ उठाई जा सकें। लाइव राइटर तो इंस्टाल करने के लिए भी यह ज़रूरी है!
स्क्राईब फायर में आपको अलग से कुछ इंस्टाल नहीं करना पड़ता और क्यूंकि यह फायरफॉक्स के लिए प्लगिन है, किसी भी ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलता है। लाइव राइटर में कुछ सुविधाएं अधिक हो सकती हैं, लेकिन यह सिर्फ़ इंटरनेट एक्सप्लोरर पर ही काम करता है और सिर्फ़ विन्डोज़ के लिए उपलब्ध है।
तो अब कभी भी, कहीं भी लिखिए और जब चाहे पोस्ट कीजिये!
बुधवार, 5 मार्च 2008
रामायण और वो दूरदर्शन वाले दिन
आज यूँही बातों बातों में पुराने दूरदर्शन वाले दिनों की बातें चल निकलीं!
और फ़िर कितने सारे पुराने कार्यक्रमों की याद आ गयी। शुरुआत हुई 'रामायण' से। तब मैं बहुत छोटा था और गाँव में था, जहाँ मेरे पापा बिजली विभाग में अभियंता थे। गढी मानिकपुर, प्रतापगढ़ में वो पहला टीवी था जो मेरे घर में आया। इसके बाद तो हर रविवार सुबह मेरे घर का बाहरी कमरा जहाँ से टीवी देखा जा सकता था, पूरी तरह भर जाता था। गाँव भर के जितने लोग उस कमरे में ऐसे बैठ सकते थे कि टीवी देखा जा सके, बैठ जाते थे।
घर के सदस्य अन्दर के कमरे में बैठ कर देखते थे, जहाँ मेरी दादी टीवी के आगे हाथ जोड़ कर बैठती थी!
महाभारत के समय तक भी यही हालत रही। एक दिन जब लगभग पूरे एक घंटे तक 'रुकावट के लिए खेद है' ही देखने को मिला तो लोग कितने निराश हुए, मैं आज तक भूला नहीं हूँ।
गाँव में एक बन्दा था, उसका असली नाम था 'संतोष' पर हम उसे 'हनुमान' कहते थे। चित्रहार देखने ज़रूर आता था और अमिताभ बच्चन के गानों का इंतज़ार करता था। डॉक्टर विश्वकर्मा सलमा सुल्ताना और कुछ और उद्घोशिकाओं के दीवाने थे। बाद में कुछ और घरों में भी टीवी आ गया था और हमारे घर में भीड़ लगना बंद हो गया।
और भी कार्यक्रम थे, 'टीपू सुलतान की तलवार', 'भारत एक खोज', 'तेनालीरामा', 'नुक्कड़', 'सर्कस', 'फौजी' वगैरह वगैरह। रविवार को एक विज्ञान गल्प आधारित कार्यक्रम आता था, 'सिग्मा' जो मुझे बहुत पसंद था। 'सिग्मा' से जुड़ी हुई एक याद है जो हमेशा शर्मसार कर देती है। मेरी दादी का शव रखा था बाहर और मैं अन्दर आकर टीवी पर 'सिग्मा' देख रहा था। किसी ने मुझे डांट कर टीवी बंद कर दिया था, मुझे समझ में नहीं आया था कि मैंने ग़लत क्या किया। बहरहाल!
कितनी सारी यादें हैं उन दिनों की। कितने नाम, कितने चेहरे, कितनी आवाजें जुड़ी हुई हैं। एक दूरदर्शन होता था, सारा परिवार साथ बैठ कर देख सकता था, देखता था। अब तो जितने चैनल हैं उतने टीवी चाहिए कि हर कोई अपने मन का कार्यक्रम देख सके! कमरों के अन्दर ही अन्दर दीवारें बनती जा रही हैं।
चलूँ फ़िर से 'रामायण' का समय हो रहा है!
और फ़िर कितने सारे पुराने कार्यक्रमों की याद आ गयी। शुरुआत हुई 'रामायण' से। तब मैं बहुत छोटा था और गाँव में था, जहाँ मेरे पापा बिजली विभाग में अभियंता थे। गढी मानिकपुर, प्रतापगढ़ में वो पहला टीवी था जो मेरे घर में आया। इसके बाद तो हर रविवार सुबह मेरे घर का बाहरी कमरा जहाँ से टीवी देखा जा सकता था, पूरी तरह भर जाता था। गाँव भर के जितने लोग उस कमरे में ऐसे बैठ सकते थे कि टीवी देखा जा सके, बैठ जाते थे।
घर के सदस्य अन्दर के कमरे में बैठ कर देखते थे, जहाँ मेरी दादी टीवी के आगे हाथ जोड़ कर बैठती थी!
महाभारत के समय तक भी यही हालत रही। एक दिन जब लगभग पूरे एक घंटे तक 'रुकावट के लिए खेद है' ही देखने को मिला तो लोग कितने निराश हुए, मैं आज तक भूला नहीं हूँ।
गाँव में एक बन्दा था, उसका असली नाम था 'संतोष' पर हम उसे 'हनुमान' कहते थे। चित्रहार देखने ज़रूर आता था और अमिताभ बच्चन के गानों का इंतज़ार करता था। डॉक्टर विश्वकर्मा सलमा सुल्ताना और कुछ और उद्घोशिकाओं के दीवाने थे। बाद में कुछ और घरों में भी टीवी आ गया था और हमारे घर में भीड़ लगना बंद हो गया।
और भी कार्यक्रम थे, 'टीपू सुलतान की तलवार', 'भारत एक खोज', 'तेनालीरामा', 'नुक्कड़', 'सर्कस', 'फौजी' वगैरह वगैरह। रविवार को एक विज्ञान गल्प आधारित कार्यक्रम आता था, 'सिग्मा' जो मुझे बहुत पसंद था। 'सिग्मा' से जुड़ी हुई एक याद है जो हमेशा शर्मसार कर देती है। मेरी दादी का शव रखा था बाहर और मैं अन्दर आकर टीवी पर 'सिग्मा' देख रहा था। किसी ने मुझे डांट कर टीवी बंद कर दिया था, मुझे समझ में नहीं आया था कि मैंने ग़लत क्या किया। बहरहाल!
कितनी सारी यादें हैं उन दिनों की। कितने नाम, कितने चेहरे, कितनी आवाजें जुड़ी हुई हैं। एक दूरदर्शन होता था, सारा परिवार साथ बैठ कर देख सकता था, देखता था। अब तो जितने चैनल हैं उतने टीवी चाहिए कि हर कोई अपने मन का कार्यक्रम देख सके! कमरों के अन्दर ही अन्दर दीवारें बनती जा रही हैं।
चलूँ फ़िर से 'रामायण' का समय हो रहा है!
बुधवार, 6 फ़रवरी 2008
भाग वैलेंटाइन डे आया!
साल का वो समय आ गया है जब मन करता है भाग के तोरा-बोरा की गुफाओं में (अरे वहीं जहाँ ओसामा भैया रहते हैं, जब मुशर्रफ़ साब के घर बिरयानी नहीं खा रहे होते) या फिर बाल ठाकरे के घर में छुप जाऊं! कहीं भी जहाँ अगले हफ्ते भर चलने वाली मीडिया की मिसाइलों से बच सकूं।
आने वाले पूरे हफ्ते हर टीवी चैनल, अखबार, रेडियो स्टेशन और इंटरनेट पोर्टल्स मेरे एकाकी जीवन का जी भर कर मखौल उडाएंगे! हाय वैलेंटाइन डे आने वाला है।
अखबारों में वैलेंटाइन डे के प्रारंभ से ले कर आज तक इसे मनाने के तरीकों पर तो लेख होंगे ही, साथ ही ग्रीटिंग कंपनियों के बढ़ते व्यापार के बारे में भी मनमानी संख्याएं होंगी! अच्छा चलो माना कि इनको नहीं देखोगे लेकिन होटलों, शॉपिंग माल, फिल्म थिएटर, गहने-जेवर की दुकानों के जो पन्ने भर भर के विज्ञापन आएंगे उनसे कैसे आंखें फेरेंगे आप? और हाँ यह सब सिर्फ 'जोड़ों' के लिए।
सभी टीवी कार्यक्रमों की कहानियाँ बे सिर पैर के घुमाव लेंगी ताकि वैलेंटाइन डे मनाया जा सके। यानी कि फिल्मी गानों के साथ बहुत सारे गुलाब और गुब्बारे! वैसे भी आजकल टीवी पर कहानी के नाम पर बचा ही क्या है। यह भी सही।
मगर कमाल तो करेंगे न्यूज़ चैनल! 'विशेष' और 'बड़ी खबर' तो आएंगे ही, हर शहर से सीधा प्रसारण: 'अब हम दर्शकों को लिए चलते हैं रोहतक जहाँ पप्पू सिंह, रिंकी खन्ना को गुलाब देने वाले हैं। हाँ दीपक कैसा माहौल है वहाँ...' (आगे तो आप समझ ही सकते हो!) शिव सेना, बीजेपी, विहिप, बजरंग दल आदि आदि के छुटभैयों की साल भर की उबासी कटेगी और उनसे भी कैमरा मुखातिब होगा। वो जोड़ों को चेतावनी देंगे और फिर कैमरे के सामने तोड़फोड़ का 'प्रदर्शन' करेंगे। (मुझे बड़ा मज़ा आता है जब टीवी कैमरे के सामने लोग पहले से टूटे गमले को लात मारते हैं, हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा!)
रेडियो स्टेशन श्रोताओं की कॉल लेंगे, उनके संदेश सुनाएंगे और उनके पसंदीदा गाने सुनाएंगे। आप तो जी बस घर बैठ के सुनते जाओ! (उसी दिन करें तो अच्छा है, हफ्ते भर किया तो मैं रेडियो फोड़ दूंगा!)
इन सबसे कोई तो बचाओ मुझे! प्लीज़। वैसे दूसरा तरीका भी है, (सिर्फ कन्याओं के लिए): मेरी वैलेंटाइन बन जाइए!
आने वाले पूरे हफ्ते हर टीवी चैनल, अखबार, रेडियो स्टेशन और इंटरनेट पोर्टल्स मेरे एकाकी जीवन का जी भर कर मखौल उडाएंगे! हाय वैलेंटाइन डे आने वाला है।
अखबारों में वैलेंटाइन डे के प्रारंभ से ले कर आज तक इसे मनाने के तरीकों पर तो लेख होंगे ही, साथ ही ग्रीटिंग कंपनियों के बढ़ते व्यापार के बारे में भी मनमानी संख्याएं होंगी! अच्छा चलो माना कि इनको नहीं देखोगे लेकिन होटलों, शॉपिंग माल, फिल्म थिएटर, गहने-जेवर की दुकानों के जो पन्ने भर भर के विज्ञापन आएंगे उनसे कैसे आंखें फेरेंगे आप? और हाँ यह सब सिर्फ 'जोड़ों' के लिए।
सभी टीवी कार्यक्रमों की कहानियाँ बे सिर पैर के घुमाव लेंगी ताकि वैलेंटाइन डे मनाया जा सके। यानी कि फिल्मी गानों के साथ बहुत सारे गुलाब और गुब्बारे! वैसे भी आजकल टीवी पर कहानी के नाम पर बचा ही क्या है। यह भी सही।
मगर कमाल तो करेंगे न्यूज़ चैनल! 'विशेष' और 'बड़ी खबर' तो आएंगे ही, हर शहर से सीधा प्रसारण: 'अब हम दर्शकों को लिए चलते हैं रोहतक जहाँ पप्पू सिंह, रिंकी खन्ना को गुलाब देने वाले हैं। हाँ दीपक कैसा माहौल है वहाँ...' (आगे तो आप समझ ही सकते हो!) शिव सेना, बीजेपी, विहिप, बजरंग दल आदि आदि के छुटभैयों की साल भर की उबासी कटेगी और उनसे भी कैमरा मुखातिब होगा। वो जोड़ों को चेतावनी देंगे और फिर कैमरे के सामने तोड़फोड़ का 'प्रदर्शन' करेंगे। (मुझे बड़ा मज़ा आता है जब टीवी कैमरे के सामने लोग पहले से टूटे गमले को लात मारते हैं, हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा!)
रेडियो स्टेशन श्रोताओं की कॉल लेंगे, उनके संदेश सुनाएंगे और उनके पसंदीदा गाने सुनाएंगे। आप तो जी बस घर बैठ के सुनते जाओ! (उसी दिन करें तो अच्छा है, हफ्ते भर किया तो मैं रेडियो फोड़ दूंगा!)
इन सबसे कोई तो बचाओ मुझे! प्लीज़। वैसे दूसरा तरीका भी है, (सिर्फ कन्याओं के लिए): मेरी वैलेंटाइन बन जाइए!
शुक्रवार, 21 दिसंबर 2007
एक सवाल गुजरात के लिए.
कह नहीं सकता कि यह सवाल पूछने के लिए यह सही समय है या नहीं, क्यूंकि गुजरात में चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं और अगर समाचार चैनलों की मानें तो नरेन्द्र भाई मोदी फिर से गद्दी सम्हालने के लिए तैयार हैं।
वापिस आते हैं मेरे प्रश्न पर जो सिर्फ गुजरातियों के लिए नहीं बल्कि उन सभी के लिए है जो मानते हैं कि मोदी ही गुजरात के मुख्यमंत्री बनने योग्य हैं।
मोदी के समर्थक मुख्यतः दो बातें बोलते हैं -
१) वो कुशल प्रशासक हैं और उन्होने गुजरात को ना केवल विकास के नक्शे पर आगे ला खड़ा किया है, उनकी ही बदौलत गुजरात में इतना निवेश हुआ है।
२) अक्षरधाम मंदिर पर हुए हमले को छोड़ दें तो गुजरात में आतंकवादी घटनाएं ना के बराबर हुई हैं।
मेरा मानना है कि दूसरी बात के लिए मोदी को श्रेय दिया जाना कोरी बकवास और आंखों में धूल झोंकने की कोशिश के सिवा कुछ नहीं है। इस तरह की बातें सिर्फ मोदी की मुस्लिम-विरोधी छवि को सहारा देने और उसको सही साबित करने का प्रयास भर है। वे कहते हैं कि आतंकवादी गुजरात पर हमले इसलिए नहीं करते क्यूंकि उन्हें डर है कि अंततः इसकी गाज गुजराती मुसलामानों पर ही गिरेगी।
और मैं इस बात को बकवास और आंखों में धूल झोंकने की कोशिश इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि गुजरात में यदि फिर से प्रशासन समर्थित दंगे होते हैं तो आतंकवादियों को बैठे बिठाये और अधिक समर्थक और शायद नए रंगरूट मिल जाएंगे! इसलिए यह तो आतंकवाद के लिए खुला आमंत्रण है और यदि इस तरह की घटनाएं नहीं हो रहीं हैं तो इसका श्रेय गुजरात पुलिस और खुफिया विभाग को दीजिए।
और अब मेरा सवाल (मैं इस बात की गहराई में नहीं जाऊंगा कि मोदी भाई कितने अच्छे प्रशासक और नेता हैं और वो कितना निवेश लाये हैं। उम्मीद करता हूँ कि वो उतने ही अच्छे नेता बने रहेंगे और गुजरात में निवेश लाते रहेंगे। हालांकि बहुत से लोग इन दावों पर सवाल खडे करते हैं जिनको मोदी समर्थक बेफिक्री से दरकिनार कर देते हैं!)
क्या यह सारा विकास और निवेशी डॉलर उस सांप्रदायिक सद्भाव को वापिस ला सकेंगे जो मोदी जी की 'बांटो और राज करो' की नीति की बलि चढ़ गया है? जो साम्प्रदायिक दुराभाव मोदी जी ने गुजरात के लोगों में पैदा किया है उसे तो हर कोई महसूस कर सकता है लेकिन वही अंत नहीं है!
मीडिया में मोदी के उन भाषणों का ज्यादा ज़िक्र नहीं हुआ है जिनमें वो केंद्रीय सरकार को 'दिल्ली सल्तनत' कह कर संबोधित करते हैं और गुजरात की आर्थिक स्वतंत्रता की घोषणा करते हैं। वो 'दिल्ली सल्तनत' को चुनौती देते हैं कि वो गुजरात से एक पैसा न ले तो गुजरात भी 'उनसे' कुछ नहीं चाहता। यानी अब यह 'हम' और 'वो' सिर्फ हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नहीं रह गया बल्कि अब यह रेखाएं देश और राज्य के बीच भी खीची जाने लगी हैं।
और अगर कोई मोदी जी के दावों या बातों पर सवाल खडे करे तो या तो वो 'द्रोही' करार दिया जाएगा और या फिर 'उन लोगों' में से जो गुजरात से ईर्ष्या करते हैं और उसे तबाह कर देना चाहते हैं।
सीधे श्बदोने में कहें तो मोदी साहब वही कर रहे हैं जो अमेरिका में बुश ने किया: काल्पनिक शत्रु बनाइये, जनता को उनका भय दिखाइए और फिर स्वयम को उनका पहरेदार बताइए.
सवाल एक बार फिर दोहरा देता हूँ: क्या साम्प्रदायिक सद्भाव वो कीमत है जो गुजरात को अपने विकास के लिए चुकानी पड़ रही है? और क्या गुजराती समझ रहे हैं यह कीमत कितनी ज्यादा भारी है?
वापिस आते हैं मेरे प्रश्न पर जो सिर्फ गुजरातियों के लिए नहीं बल्कि उन सभी के लिए है जो मानते हैं कि मोदी ही गुजरात के मुख्यमंत्री बनने योग्य हैं।
मोदी के समर्थक मुख्यतः दो बातें बोलते हैं -
१) वो कुशल प्रशासक हैं और उन्होने गुजरात को ना केवल विकास के नक्शे पर आगे ला खड़ा किया है, उनकी ही बदौलत गुजरात में इतना निवेश हुआ है।
२) अक्षरधाम मंदिर पर हुए हमले को छोड़ दें तो गुजरात में आतंकवादी घटनाएं ना के बराबर हुई हैं।
मेरा मानना है कि दूसरी बात के लिए मोदी को श्रेय दिया जाना कोरी बकवास और आंखों में धूल झोंकने की कोशिश के सिवा कुछ नहीं है। इस तरह की बातें सिर्फ मोदी की मुस्लिम-विरोधी छवि को सहारा देने और उसको सही साबित करने का प्रयास भर है। वे कहते हैं कि आतंकवादी गुजरात पर हमले इसलिए नहीं करते क्यूंकि उन्हें डर है कि अंततः इसकी गाज गुजराती मुसलामानों पर ही गिरेगी।
और मैं इस बात को बकवास और आंखों में धूल झोंकने की कोशिश इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि गुजरात में यदि फिर से प्रशासन समर्थित दंगे होते हैं तो आतंकवादियों को बैठे बिठाये और अधिक समर्थक और शायद नए रंगरूट मिल जाएंगे! इसलिए यह तो आतंकवाद के लिए खुला आमंत्रण है और यदि इस तरह की घटनाएं नहीं हो रहीं हैं तो इसका श्रेय गुजरात पुलिस और खुफिया विभाग को दीजिए।
और अब मेरा सवाल (मैं इस बात की गहराई में नहीं जाऊंगा कि मोदी भाई कितने अच्छे प्रशासक और नेता हैं और वो कितना निवेश लाये हैं। उम्मीद करता हूँ कि वो उतने ही अच्छे नेता बने रहेंगे और गुजरात में निवेश लाते रहेंगे। हालांकि बहुत से लोग इन दावों पर सवाल खडे करते हैं जिनको मोदी समर्थक बेफिक्री से दरकिनार कर देते हैं!)
क्या यह सारा विकास और निवेशी डॉलर उस सांप्रदायिक सद्भाव को वापिस ला सकेंगे जो मोदी जी की 'बांटो और राज करो' की नीति की बलि चढ़ गया है? जो साम्प्रदायिक दुराभाव मोदी जी ने गुजरात के लोगों में पैदा किया है उसे तो हर कोई महसूस कर सकता है लेकिन वही अंत नहीं है!
मीडिया में मोदी के उन भाषणों का ज्यादा ज़िक्र नहीं हुआ है जिनमें वो केंद्रीय सरकार को 'दिल्ली सल्तनत' कह कर संबोधित करते हैं और गुजरात की आर्थिक स्वतंत्रता की घोषणा करते हैं। वो 'दिल्ली सल्तनत' को चुनौती देते हैं कि वो गुजरात से एक पैसा न ले तो गुजरात भी 'उनसे' कुछ नहीं चाहता। यानी अब यह 'हम' और 'वो' सिर्फ हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नहीं रह गया बल्कि अब यह रेखाएं देश और राज्य के बीच भी खीची जाने लगी हैं।
और अगर कोई मोदी जी के दावों या बातों पर सवाल खडे करे तो या तो वो 'द्रोही' करार दिया जाएगा और या फिर 'उन लोगों' में से जो गुजरात से ईर्ष्या करते हैं और उसे तबाह कर देना चाहते हैं।
सीधे श्बदोने में कहें तो मोदी साहब वही कर रहे हैं जो अमेरिका में बुश ने किया: काल्पनिक शत्रु बनाइये, जनता को उनका भय दिखाइए और फिर स्वयम को उनका पहरेदार बताइए.
सवाल एक बार फिर दोहरा देता हूँ: क्या साम्प्रदायिक सद्भाव वो कीमत है जो गुजरात को अपने विकास के लिए चुकानी पड़ रही है? और क्या गुजराती समझ रहे हैं यह कीमत कितनी ज्यादा भारी है?
गुरुवार, 9 अगस्त 2007
शाम-ए-अवध
कभी सुना था कि लोग कहते थे मुस्कुराइये कि आप लखनऊ में हैं! अब तो टेंपो के धुंए और सत्ताधारी दलों के नेताओं और उनके गुर्गों के कारनामों ने शर्म से अगर मुँह काला ना किया हो तो ज़रूर मुस्कुराइये!
लेकिन कोई कुछ भी कहे इस शहर की चंद पुरानी इमारतें अभी तक अपने आप को 'जेनरेशन गैप' या किसी ठेकेदार के लालच की बलि चढ़ने से तो बचाएँ हैं ही, शहर को भी सांस्कृतिक विरासत के नाम पर एक सम्मानजनक पायदान पर ला खड़ा करती हैं!
लेकिन कोई कुछ भी कहे इस शहर की चंद पुरानी इमारतें अभी तक अपने आप को 'जेनरेशन गैप' या किसी ठेकेदार के लालच की बलि चढ़ने से तो बचाएँ हैं ही, शहर को भी सांस्कृतिक विरासत के नाम पर एक सम्मानजनक पायदान पर ला खड़ा करती हैं!
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